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महावीर स्वामी / Mahaveer Swami

महावीर स्वामी : नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका historywithsharmaji में, दोस्तों आज हम जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी के बारे में अध्ययन करेंगे:




महावीर स्वामी


महावीर स्वामी : 

जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी थे।
• जन्म -वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ।
• पिता- सिद्धार्थ (ज्ञातृक कुल के मुखिया थे)
• माता- त्रिशला( लिच्छवी गणराज्य प्रमुख चेटक की बहन थी) 
• बचपन का नाम- वर्द्धमान 
• पत्नी - यशोदा 
• पुत्री - प्रियदर्शना 
• महावीर ने 30 वर्ष की अवस्था में बड़े भाई नंदिवर्द्धन की आज्ञा लेकर गृह त्याग कर दिया।
• 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात् जृम्भिक ग्राम (साल वृक्ष के नीचे) के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर वर्द्धमान को कैवल्य प्राप्त हुआ।
• कैवल्य प्राप्त होने के पश्चात् ये केवलिन, इन्द्रियों को जीत लेने के कारण जितेन्द्रिय तथा अतुल पराक्रम दिखाने के कारण ये महावीर कहलाए।
• 72 वर्ष की उम्र में राजगृह के निकट पावापुरी (मल्ल राज्य) में 468 ई. पू. में निर्वाण प्राप्त किया। 
• महावीर की मृत्यु के बाद केवल एक गणधर सुधर्मन जीवित बचा, जो जैन संघ का उनके बाद प्रथम अध्यक्ष बना।
• जैन मठों को दक्षिण भारत में बसादि के नाम से जाना गया है।

त्रिरत्न:

सम्यक् दर्शन - सत में विश्वास।

• सम्यक् ज्ञान - वास्तविक ज्ञान।

• सम्यक् आचरण - सांसारिक विषयों में उत्पन्न सुख -दु:ख के प्रति समभाव।

जैन धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी:

निर्वाण : आत्मा को कर्मों के बंधन से छुटकारा दिलाना 'निर्वाण' कहा गया है।

• अनन्त चतुष्टय की अवधारणा जैन धर्म से सम्बन्धित है।

• “शलाका पुरुष” अवधारणा का संबंध जैन धर्म से है।

• जैन धर्म में ज्ञान प्राप्ति के तीन स्रोत माने गए हैं :-प्रत्यक्ष, अनुमान तथा तीर्थंकरों के वचन 

• जैन धर्म में विद्रोह जमालि व तीसगुप्त ने किया था।

• जमालि महावीर के प्रथम शिष्य तथा उनकी पुत्री प्रियदर्शना के पति थे।

• महावीर ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह की विपुलाचल की पहाड़ी पर दिया। बुद्ध और महावीर समकालीन थे।


महावीर की शिक्षाएं :

1.   महावीर ने वेदों और कर्मकांडों के अस्तित्व को अस्वीकृत कर दिया।
2.   भगवान के अस्तित्व में विश्वास नहीं किया। बाद में जैन धर्म में भगवान के अस्तित्व को मान्यता दी गई लेकिन उनका स्थान महावीर स्वामी से नीचे रखा गया।
3.  आत्मा के स्थानांतरण एवं कर्म के अस्तित्व को मान्यता प्रदान की। 
4.   इन्होंने समानता पर जोड़ दिया लेकिन वर्ण व्यवस्था की निंदा नहीं की।
5.  महावीर स्वामी ने अहिंसा पर जोर दिया ।


जैन धर्म के पाँच सिद्धांत :

 सत्य         -   झूठ नहीं बोलना

अहिंसा      -   हिंसा नहीं करना

अस्तेय।     -    चोरी नहीं करना

अपरिग्रह।   -     संपति का संचय न करना

बाह्यचर्य   - महिलाओं से दूर रहना । इस सिद्धांत को महावीर स्वामी ने दिया था।


जैन धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली


आश्रव : यह आत्मा के कम करने के पीछे का मन और शरीर के प्रभाव को संदर्भित करता है। 


संवर : कर्मों के आश्रम को रोकना 


निर्जरा : इसका अर्थ मोक्ष की प्राप्ति के लिए आत्मा से जुड़े कर्मों का शय करना।


संलेखना : इसे संथारा भी कहते हैं इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपने मृत्यु तक अन्न व जल के ग्रहण का त्याग कर देता है।


कैवल्य : केवल का तात्पर्य परम आनंद से है। 


आगम: जैन साहित्य को आगम कहा जाता है। इसके अंतर्गत जैन धर्म की प्रमुख पुस्तक आती हैं जो अर्ध मगधीभाषा में लिखी गई है जो प्राकृत भाषा का ही रुप है।



जैन समितियां : 


प्रथम समिति : जैन धर्म की प्रथम समिति 300 से 322 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में आयोजित की गई थी। इसके अध्यक्ष चंद्रगुप्त मौर्य शासन के दौरान स्थूलभद्र थे। इस समिति में 12 अंगों का प्रतिपादनहुआ 


द्वितीय समिति  :जैन धर्म की द्वितीय समिति 300 से 322 से ईसा पूर्व में वल्लभी में आयोजित की गई थी इसके अध्यक्ष देवश्री क्षमाश्रमण थे। इसके अंतर्गत 11 अंग और उपांगों की रचना की गई।


जैन धर्म की शाखाएं: जैन धर्म को मुख्यतः दो शाखों में भी विभाजित किया गया है 

1.    दिगंबर 
2.   श्वेतांबर 

दिगंबर शाखा : इस शाखा के प्रवर्तक भद्रबाहु थे। इस शाखा में संपूर्ण रूप से नग्न रहने में विश्वास किया गया। दिगंबर संप्रदाय के पुरुष अनुयायी कपड़े नहीं पहन सकते थे जबकि महिला अनुवाई सफेद वस्त्र धारण कर सकती थी। इस शाखा के मानने वाले लोगों को जैन धर्म के पांचो सिद्धांत सत्य, अहिंसा,असतेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। इस शाखा में महिलाएं कैवल्य की प्राप्ति नहीं कर सकतीं हैं। दिगंबर शाखा की प्रमुख उपशाखाएं मूला संघ, विसपंथ, तारापंथ और साम्यपंथ है। गुमनाम पंथ और तोता पंथ भी इसके अंतर्गत आते है।




श्वेतांबर शाखा : इस शाखा के प्रवर्तक स्थल भद्र थे। इस शाखा के अनुयाई सफेद वस्त्र धारण कर सकते थे। इस शाखा में ब्रह्मचर्य को छोड़कर के शेष चार सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक था। इस शाखा के अंतर्गत महिलाएं भी कैवल्य की प्राप्ति कर सकती थी। मूर्ति पूजक, तेरापंथी, स्थानकवासी इत्यादि इस श्वेतांबर शाखा के उप शाखाएं हैं।


जैन धर्म की शिक्षाएँ :-

• जैन साहित्य प्राकृत (अर्द्धमागधी) भाषा में लिखा गया। 
• जैन साहित्य को आगम कहा जाता है जिसमें 12 अंग, 12 उपांग, प्रकीर्ण, छन्दसूत्र आदि सम्मिलित हैं।
• पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं के लिए चार व्रतों का विधान किया था, अहिंसा, सत्य, अस्तेय तथा अपरिग्रह।
• महावीर स्वामी ने ब्रह्मचर्य को जोड़कर पंचमहाव्रत धर्म का प्रतिपादन किया।
• सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर को नहीं मानना। (अनीश्वरवादी)
• देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया है परन्तु इनका स्थान 'जिन' से नीचे है।
• जैन धर्म कर्मवादी है तथा इसमें पुनर्जन्म की मान्यता है।जैन धर्म में स्यादवाद को जन्म दिया।
जैन धर्म अनेकांतवाद की अवधारणा को भी स्वीकार करता है।





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