ज्ञानपीठ पुरस्कार 2024: विनोद कुमार शुक्ल
59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार (2024) हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक विनोद कुमार शुक्ल को प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें भारतीय साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है। वे छत्तीसगढ़ के पहले और हिंदी के 12वें साहित्यकार हैं, जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ है।
विनोद कुमार शुक्ल का जीवन परिचय
जन्म: 1 जनवरी 1937, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
शिक्षा: जबलपुर विश्वविद्यालय से कृषि विज्ञान में स्नातकोत्तर
साहित्यिक यात्रा की शुरुआत: 1971 में पहला काव्य संग्रह 'लगभग जय हिंद' प्रकाशित
प्रमुख रचनाएँ
कविता संग्रह
1. लगभग जय हिंद (1971)
2. वही बात और दूसरे कविताएँ
3. अतीत में कुछ (2000)
4. सब कुछ होना बचा रहेगा (2010)
उपन्यास
1. नौकर की कमीज (1979) – इस पर मणि कौल ने फिल्म बनाई
2. खिलेगा तो देखेंगे (2001)
3. दीवार में एक खिड़की रहती थी (1996) – इस पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला
4. गर्मी की रात ठंडी हो गई
कहानी संग्रह
1. रामजी यादव की प्रेमकथा
2. महाविद्यालय
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
1. ज्ञानपीठ पुरस्कार (2024)
2. साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999) – 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के लिए
3. पद्म श्री पुरस्कार (2019)
4. पेन/नाबोकोव पुरस्कार (2023) – अंतर्राष्ट्रीय साहित्य में योगदान के लिए
5. व्यास सम्मान
ज्ञानपीठ पुरस्कार के बारे में
यह भारत का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार है, जो भारतीय भाषाओं में लिखने वाले साहित्यकारों को दिया जाता है।
1961 में इसकी स्थापना हुई और पहली बार 1965 में यह पुरस्कार प्रदान किया गया।
विजेताओं को 11 लाख रुपये नकद, वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा और एक प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।
यह पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ संस्था द्वारा प्रदान किया जाता है।
➤ हिंदी के अन्य ज्ञानपीठ विजेता:
1968 – सुमित्रानंदन पंत
1975 – रामधारी सिंह दिनकर
1978 -सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
1982-महादेवी वर्मा
1992- नरेश मेहता
1999 – गोविंद मिश्र
2005- कुंवरनारयणण
2009 – अमरकांत, श्रीलाल शुक्ल
2013- केदारनाथ सिंह
2017 – कृष्णा सोबती
2024 – विनोद कुमार शुक्ल
विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएँ सरल भाषा, गहरे विचार और यथार्थवाद के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका लेखन ग्राम्य जीवन और समाज की सादगी को दर्शाता है।
88 वर्षीय शुक्ल जी अपनी साधारण भाषा, गहन संवेदनाओं और अनूठी लेखन शैली के लिए पहचाने जाते हैं।
"मुझे लिखना बहुत था, बहुत कम लिख पाया...
महसूस किया बहुत, लेकिन लिखा थोड़ा ही।
कितना कुछ लिखना अभी बाकी है। ...इस बचे हुए को मैं लिख लेता, अपने बचे होने तक।"
उनकी चर्चित कृतियों में
-दीवार में एक खिड़की रहती थी
-नौकर की कमीज़
-सब कुछ होना बचा रहेगा
जैसे साहित्यिक रत्न शामिल हैं।
इस पुरस्कार के साथ उन्हें ₹11 लाख, मां सरस्वती की कांस्य प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र भेंट किया जाएगा।
यह सिर्फ एक लेखक का नहीं, हिंदी भाषा और उसकी आत्मा का सम्मान है।
ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वालों में जी. शंकर कुरुप, इसके पहले प्राप्तकर्ता और आशापूर्णा देवी, पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला हैं